Friday, May 15, 2020

कुछ इधर उधर की बातें

नमस्कार दोस्तों,

कैसे हो आप सब - जरूर कुशल होंगें - यह भी कोई पूछने की बात है।

दोस्तों अलग अलग समय काल में आपके अलग अलग दोस्त होते है और आप अलग अलग मनःस्थिति में रहते हो।  आपके सोचने का स्तर और दिशा भी आपके उस समय के सामाजिक परिवेश , दोस्तों और अंतरंग लोगों के व्यवहार पर निर्भर करता है। 

परिवार के लोगों का आपके साथ आचरण आपके ऊपर एक अमिट छाप छोड़ जाता है और वह भी तब जब आप एक ऐसे परिवर्तन से गुजर रहे हो जहाँ आपके हार्मोन्स में एक जबरदस्त चेंज होता है और आप लड़कपन से यौवन की तरफ अग्रसर होते हो। 

एक बच्चा - स्कूल तक एक कच्ची मिट्टी की तरह होता - और जब वो कॉलेज जाने लगता है तब उसपर विशेष ध्यान देने की जरुरत होती है।  यहाँ उसे एक अच्छे दोस्त और दिशा निर्देशक की बहुत जरुरत होती है। एक गलत कदम उसे जिंदगी भर के लिए एक ऐसी स्थिति में ला देता है की फिर आप कितने भी अच्छे काम करो और कुछ भी करो उस गलती का अहसाह आपको खुद भी होता है और कुछ लोग ऐसे होते है जो उन बातों को बार बार हर जगह समाज में आपको निचा दिखने के लिए करते है और हाँ ऐसा करते समय वो अपनी गलतियों को इस खूबसूरती से छुपा जाते है की सब को भरोसा हो जाता है की गलती सिर्फ और सिर्फ दूसरे की है।  

कहते है की एक बच्चा अच्छी आदत देरी से और प्रयत्नों से सीखता है और बुरी आदत वह अपने बड़ों को अनुसरण करते हुए खुद ही सिख जाता है। 

मेरा स्वाभाव एक खोजी प्रकृति का था और है ,  मैं हमेशा किसी भी मशीन में क्या खराबी हो सकती है उसके पीछे अपना दिमांग लगता था - मैंने  सभी तरह के रेडिओ, चाभी भरने वाले ग़र्मोफोन ,वो काली HMV की L . P . DISC जिसे रिकॉर्ड कहते थे , पुराना टेप रिकॉर्डर, कैसेट टेप रिकॉर्डर , वाल्व टाइप कंप्यूटर , उसकी वो बड़ी वाली फ्लॉपी डिस्क , फिर मध्यम फ्लॉपी डिस्क फिर कॉम्पैक्ट फ्लॉपी, C .D .DRIVE , पेन ड्राइव , 386, 486, PENTIUM, PENTIUM -1 TO PENTIUM -5 और अब LAP -TOP सभी खोले है और कुछ  को रिपेयर भी किया है।  अधिकतर तो ख़राब ही हुए है और ख़राब भी ऐसे की कबाड़ी  हाथ नहीं लगते थे।

 

 

दोस्तों  आप सोचते होंगे कि  ये आदमी सिर्फ अपनी तारीफ ही करता रहता है क्या करूँ भटक जाता हूँ.

हाँ तो दोस्तों मैं बता रहा था मेरी खोजी आदत के बारे में. - मैं अपने शारीरिक बदलावों को खेल के मैदान में संगठित कर रहा था की मुझे एक दिन बाथरूम में एक किताब मिली जिसे किसी ने छुपा कर रखा था, वह एक अश्लील साहित्य था जिसे मेरे बड़े भाई ने वहां पर छुपा कर रखी थी ( इसका पता मुझे बाद में पड़ा ) धीरे धीरे मैं ऐसी किताबों की खोज में रहता था और उक्सुकता वश उन्हें पढता  भी था।  मुझे पता नहीं एक अजीब सा आनंद आता था।  मैंने इसकी कभी शिकायत नहीं की और पढ़ कर उन किताबों को चुप चाप वहीँ वापस रख देता था.

१९७४ में मेरे भाई का विवाह एक पैसे वाले परिवार की बड़ी लड़की से हो गई. और यहीं से हमारे घर में एक अजीब सा वातावरण रहने लग गया। एक तनाव , एक खिचाव - पता नहीं क्या और क्यों।

भाई के विवाह के समय पिताजी ने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया और इस चक्कर में उन्होंने एक ऐसे आदमी से लोन लिया जिसने पिताजी की पूरी जिंदगी तबाह कर दी. इसके बारे में कभी विस्तार से बताऊंगा।

घर की कलह को देखते हुए १७ साल की छोटी उम्र में ही मेरी बहन की शादी १९७६ में  दिल्ली के एक पैसे वाले हरियाणवी परिवार में कर दी गई जो की आगे चल कर हमारे परिवार की एक और गलती के रूप में सामने आई. किसी दिन बहन के बारे में भी बताऊंगा।

घर में दादीजी और भाभी का एक ग्रुप बन गया था और माँ को कई तरह से परेशान करने लगे थे।  मैं माँ की तरफ था।  भाई उस समय CA की पढाई कर रहा था और आर्टिकल शिप में किसी CA के यहाँ जाता था. पिताजी उन दिनों कुछ थके थके और चड़चिड़े से हो गए थे - अब समझ में आता है की उनकी ऐसी हालत के पीछे भाई के विवाह के समय में लिया गया लोन और उससे उत्पन्न परिस्थितियां थी.

जैसा की मैंने बताया की मैं एक खुराफाती दिमाग का लड़का था और रेडिओ असेम्बली सीखता था तो मैंने घर की फ़ोन लाइन में से एक लाइन निकल  कर उसे टेप रिकॉर्डर से कनेक्ट करके रिकॉर्ड करने का सिस्टम बना लिया था और उससे भाभी और उनकी माँ एवं एक खास दोस्त थी जो  भाभी को काफी उल्टा सीधा सिखाया करती थी , उनकी बातों को रिकॉर्ड करके माँ को सुनाया करता था।

दोस्तों कुछ बातें भूलना अच्छा होता  परन्तु समयचक्र के कुछ पन्ने कभी कभी याद कर लेना चाहिए 

मेरी यह कहानी किसी को बदनाम या अपने को पाक साफ करने या बताने के लिए नहीं लिख रहा हूँ यह तो मन का भाव है और जो एक तरफ की बातों को सुन कर अपना निर्णय बना लेते हैं उन्हें - यदि वो इसे पढ़े - तो यह बताने की कोशिश है की सब एक तरफ़ा नहीं होता जनाब - हर कोई कभी न कभी गलती करता है - आपको उसके अत्तीत से नहीं उसके वर्तमान के चरित्र और कार्यों को देखें और अपना निष्कर्ष खुद निकालें -नकारात्मक, कुंठित और खुद के तरीके से दुनिया को चलने वाले की सुनने के बजाय अपना दिमाग और अक्ल लगाना चाहिए। 

दोस्तों आगे की कहानी फिर कभी -

नमस्ते




Sunday, May 10, 2020

मेरी दादीजी


नमस्कार दोस्तों ,

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप सब सकुशल होंगें।  आप सब से निवेदन है की सामाजिक नियमों का पालन करते हुए अपने और अपने प्रिय जनों के स्वस्थ का सम्पूर्ण ध्यान रखें।

दोस्तों, मुझे करीब १० से १२ दिन हो गए यहाँ कुछ लिखे हुए और उसका कारण  है मेरे मन की दुविधा। 

दोस्तों, स्कूल टाइम तक तो सब ठीक था और सच कहूं तो मैं इतना छोटा था कि मुझे दुनियादारी का इतना अहसास न तो हुआ और न ही कभी होने दिया गया।  घर का छोटा बेटा था और बहुत ज्यादा सब से घुलता मिलता नहीं था तो मुझे बच्चा ही माना  जाता रहा और घर के किसी फैसले में मुझे शामिल ही नहीं किया जाता था और मुझे भी इस बात से ज्यादा कोई मतलब ही रहा।  मैं तो अपने में ही मस्त और व्यस्त रहता था।

दोस्तों, अपनी सत्य कथा लिखते हुए शायद कहीं ऐसा भी हो सकता है कि मैं दूसरे पक्ष के विचारों को ठीक से न बता पाऊ तो मुझे माफ़ करियेगा।

दरअसल वर्ष १९७४ की अप्रैल में मेरे बड़े भाई का विवाह हुआ और वहीँ से हम लोगों के (हमारे परिवार के ) सुख शांति में  क्रमशः कमी आनी  शुरू हो गई - यह सच्चाई है - कोई माने या ना माने।

चार रूम और बड़ा हॉल , बालकनी, दो बाथरूम, लॉफ्ट, किचन, दो एंट्रेंस , फ़ोन, गाड़ी, समय के हिसाब से भरपूर घर था - मुंबई में आज के दिन हम मध्यम वर्गी - ईमानदार व्यक्ति सोच भी नहीं सकता।

यहाँ मैं मेरी दादीजी, माँ, बाबूजी, मेरा भाई, और मेरी बहन बड़े ही आराम से रहते थे।

दोस्तों जब दादीजी का जिक्र आ गया तो मैं उनके बारे में कुछ कहना चाहूंगा - उम्मीद है आप भी इसे जानना चाहेंगे।

मेरे दादाजी ने चार शादियां की थी और मेरी दादी चौथी थी।  दादीजी के पहले वाली सभी डिलीवरी के समय गुजर गई थी ऐसा बताया जाता है।  उस समय मेडिकल साइंस इतना विकसित नहीं था।  मेरी दादी से दो बच्चे हुए -पिताजी (जिन्हे हम बाबूजी कहते हैं ) और एक लड़की ( मेरी भुआ  सुशीला  ) - इनका भी देहांत छोटी उम्र में ही हो गया था।  पिताजी जब ४ साल के थे तभी मेरे दादाजी का कैंसर की बीमारी से स्वर्गवास हो गया था। 

पिताजी के चाचा लोगों  (मेरे दादाजी ९ भाई थे और २ बहनें ) ने पिताजी को बहुत दुःख दिए यहाँ तक की एक बार जहर भी दे दिया था। किसी तरह दादीजी को पता चला और पिताजी को बचा लिया गया। दादीजी  पिताजी को लेकर अपने मायके चली गई और काफी समय वहां रहीं। इन सब बातों का उनके स्वस्थ पर काफी असर हुआ और वो बीमार ही रहती थी।  माँ बताती हैं की उन्हें दिन में दो से तीन बार मॉर्फिन  के इंजेक्शन लगाए जाते थे , इस इंजेक्शन की उन्हें आदत हो गई थी ।  धीरे धीरे  पिताजी ने उन्हें डबल डिस्टिल्ड वाटर के इंजेक्शन देने शुरू किये।  कुछ समय तो चलता रहा - माँ और पिताजी खुद ही इंजेक्शन दे दिया करते थे।  जब दादीजी को किसी तरह मालूम पड़ा तो फिर एक कैप्सूल - नाम भूल रहा हूँ - चालू किये।  कुछ दिनों बाद पिताजी ने कैप्सूल में से दवाई निकाल  कर उसमे ग्लूकोस पाउडर भरना शुरू किया।  एक दिन एक कैप्सूल मुँह में खुल गया तो फिर हंगामा हो गया - फिर एक दवाई आती थी सोनलगिन टेबलेट्स  (आजकल तो वो बंद हो गई है , मुझे यादहै पिंक कलर की गोली होती थी और एल्युमीनियम की डब्बी में आती थी ) उसे कई दिनों तक लेती थी और जब वो बंद हो गई तो कॉम्पोसे टेबलेट्स लास्ट तक लेती थी।

दोस्तों ये अतीत भी क्या चीज है कहाँ से कहाँ ले जाती है.


हाँ तो मेरी दादीजी बहुत ही पुराने ख्यालात  की थी और रसोई में उनके नियम बहुत ही कड़क थे. उनकी माँ से कम ही बनती थी।  दोनों में एक अदृश्य सा तनाव महसूस किया जा सकता था।  मेरी उम्र उतनी तो नहीं थी की मैं जज कर सकूँ की कौन सही है कौन गलत परन्तु दादीजी के कई नियमों से सब परेशान रहते थे।  वैसे दादीजी बड़े ही खुशमिजाज रहती थी या रहने का प्रयास करती थी।  मैं तो उनसे बड़ी मस्ती करता था।  उन्हें अपने मायके  के लोगों को सामान और पैसे देना अच्छा लगता था।  उनकी अलमारी भरी पड़ी रहती थी एक सामान निकालो तो पांच सामान गिरते थे।  एकदम अनपढ़ थी परन्तु दवाइयों को उनके पैकिंग से बराबर पहचान लेती थी

एक मजेदार बात याद आई है सोचा बता ही दूँ - एक बार हमारे ड्राइवर को दस्त लगने शुरू हुए तो उसने दादीजी को कहा - दादीजी ने उसे chlorostep tabs (शायद अब बंद हो गई है ) दे दी - ड्राइवर दादीजी के पास ३ दिन बाद फिर आया और हाथ जोड़ कर बोला - माजी (दादीजी  को सब माजी ही कहते थे )- मुझे ३ दिनों  से दस्त नहीं हो रहा अब कोई ऐसी दवाई दीजिये की पेट साफ़ हो .

दोस्तों आज बस इतना ही - जल्दी ही आऊंगा  - कंटिन्यू करने - 

धन्यवाद 

खुश रहें मस्त रहें       नमस्ते