Sunday, May 10, 2020

मेरी दादीजी


नमस्कार दोस्तों ,

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप सब सकुशल होंगें।  आप सब से निवेदन है की सामाजिक नियमों का पालन करते हुए अपने और अपने प्रिय जनों के स्वस्थ का सम्पूर्ण ध्यान रखें।

दोस्तों, मुझे करीब १० से १२ दिन हो गए यहाँ कुछ लिखे हुए और उसका कारण  है मेरे मन की दुविधा। 

दोस्तों, स्कूल टाइम तक तो सब ठीक था और सच कहूं तो मैं इतना छोटा था कि मुझे दुनियादारी का इतना अहसास न तो हुआ और न ही कभी होने दिया गया।  घर का छोटा बेटा था और बहुत ज्यादा सब से घुलता मिलता नहीं था तो मुझे बच्चा ही माना  जाता रहा और घर के किसी फैसले में मुझे शामिल ही नहीं किया जाता था और मुझे भी इस बात से ज्यादा कोई मतलब ही रहा।  मैं तो अपने में ही मस्त और व्यस्त रहता था।

दोस्तों, अपनी सत्य कथा लिखते हुए शायद कहीं ऐसा भी हो सकता है कि मैं दूसरे पक्ष के विचारों को ठीक से न बता पाऊ तो मुझे माफ़ करियेगा।

दरअसल वर्ष १९७४ की अप्रैल में मेरे बड़े भाई का विवाह हुआ और वहीँ से हम लोगों के (हमारे परिवार के ) सुख शांति में  क्रमशः कमी आनी  शुरू हो गई - यह सच्चाई है - कोई माने या ना माने।

चार रूम और बड़ा हॉल , बालकनी, दो बाथरूम, लॉफ्ट, किचन, दो एंट्रेंस , फ़ोन, गाड़ी, समय के हिसाब से भरपूर घर था - मुंबई में आज के दिन हम मध्यम वर्गी - ईमानदार व्यक्ति सोच भी नहीं सकता।

यहाँ मैं मेरी दादीजी, माँ, बाबूजी, मेरा भाई, और मेरी बहन बड़े ही आराम से रहते थे।

दोस्तों जब दादीजी का जिक्र आ गया तो मैं उनके बारे में कुछ कहना चाहूंगा - उम्मीद है आप भी इसे जानना चाहेंगे।

मेरे दादाजी ने चार शादियां की थी और मेरी दादी चौथी थी।  दादीजी के पहले वाली सभी डिलीवरी के समय गुजर गई थी ऐसा बताया जाता है।  उस समय मेडिकल साइंस इतना विकसित नहीं था।  मेरी दादी से दो बच्चे हुए -पिताजी (जिन्हे हम बाबूजी कहते हैं ) और एक लड़की ( मेरी भुआ  सुशीला  ) - इनका भी देहांत छोटी उम्र में ही हो गया था।  पिताजी जब ४ साल के थे तभी मेरे दादाजी का कैंसर की बीमारी से स्वर्गवास हो गया था। 

पिताजी के चाचा लोगों  (मेरे दादाजी ९ भाई थे और २ बहनें ) ने पिताजी को बहुत दुःख दिए यहाँ तक की एक बार जहर भी दे दिया था। किसी तरह दादीजी को पता चला और पिताजी को बचा लिया गया। दादीजी  पिताजी को लेकर अपने मायके चली गई और काफी समय वहां रहीं। इन सब बातों का उनके स्वस्थ पर काफी असर हुआ और वो बीमार ही रहती थी।  माँ बताती हैं की उन्हें दिन में दो से तीन बार मॉर्फिन  के इंजेक्शन लगाए जाते थे , इस इंजेक्शन की उन्हें आदत हो गई थी ।  धीरे धीरे  पिताजी ने उन्हें डबल डिस्टिल्ड वाटर के इंजेक्शन देने शुरू किये।  कुछ समय तो चलता रहा - माँ और पिताजी खुद ही इंजेक्शन दे दिया करते थे।  जब दादीजी को किसी तरह मालूम पड़ा तो फिर एक कैप्सूल - नाम भूल रहा हूँ - चालू किये।  कुछ दिनों बाद पिताजी ने कैप्सूल में से दवाई निकाल  कर उसमे ग्लूकोस पाउडर भरना शुरू किया।  एक दिन एक कैप्सूल मुँह में खुल गया तो फिर हंगामा हो गया - फिर एक दवाई आती थी सोनलगिन टेबलेट्स  (आजकल तो वो बंद हो गई है , मुझे यादहै पिंक कलर की गोली होती थी और एल्युमीनियम की डब्बी में आती थी ) उसे कई दिनों तक लेती थी और जब वो बंद हो गई तो कॉम्पोसे टेबलेट्स लास्ट तक लेती थी।

दोस्तों ये अतीत भी क्या चीज है कहाँ से कहाँ ले जाती है.


हाँ तो मेरी दादीजी बहुत ही पुराने ख्यालात  की थी और रसोई में उनके नियम बहुत ही कड़क थे. उनकी माँ से कम ही बनती थी।  दोनों में एक अदृश्य सा तनाव महसूस किया जा सकता था।  मेरी उम्र उतनी तो नहीं थी की मैं जज कर सकूँ की कौन सही है कौन गलत परन्तु दादीजी के कई नियमों से सब परेशान रहते थे।  वैसे दादीजी बड़े ही खुशमिजाज रहती थी या रहने का प्रयास करती थी।  मैं तो उनसे बड़ी मस्ती करता था।  उन्हें अपने मायके  के लोगों को सामान और पैसे देना अच्छा लगता था।  उनकी अलमारी भरी पड़ी रहती थी एक सामान निकालो तो पांच सामान गिरते थे।  एकदम अनपढ़ थी परन्तु दवाइयों को उनके पैकिंग से बराबर पहचान लेती थी

एक मजेदार बात याद आई है सोचा बता ही दूँ - एक बार हमारे ड्राइवर को दस्त लगने शुरू हुए तो उसने दादीजी को कहा - दादीजी ने उसे chlorostep tabs (शायद अब बंद हो गई है ) दे दी - ड्राइवर दादीजी के पास ३ दिन बाद फिर आया और हाथ जोड़ कर बोला - माजी (दादीजी  को सब माजी ही कहते थे )- मुझे ३ दिनों  से दस्त नहीं हो रहा अब कोई ऐसी दवाई दीजिये की पेट साफ़ हो .

दोस्तों आज बस इतना ही - जल्दी ही आऊंगा  - कंटिन्यू करने - 

धन्यवाद 

खुश रहें मस्त रहें       नमस्ते

























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