(Creative Subodh)
I am 62 yrs B.Sc (Physics) from Calcutta University. Worked in various manufacturing units having vast knowledge of Plastics , Rubber, Abrasives, Vacuum Metalizing , Ni, Cu, Chrome plating, Gold Forming, Diamond Assorting, Lost Wax Casting of Gold with Diamond white metal spin casting, Fabrication of S. Steel, PVC, PP, Acrylic sheet Fabrication, PVC and Fluid bed coating on Jigs and fixtures. Since 1995 I am making Rubber Bonded Polishing wheels and points. I will put my experience of life
Friday, May 22, 2020
Friday, May 15, 2020
कुछ इधर उधर की बातें
नमस्कार दोस्तों,
कैसे हो आप सब - जरूर कुशल होंगें - यह भी कोई पूछने की बात है।
दोस्तों अलग अलग समय काल में आपके अलग अलग दोस्त होते है और आप अलग अलग मनःस्थिति में रहते हो। आपके सोचने का स्तर और दिशा भी आपके उस समय के सामाजिक परिवेश , दोस्तों और अंतरंग लोगों के व्यवहार पर निर्भर करता है।
परिवार के लोगों का आपके साथ आचरण आपके ऊपर एक अमिट छाप छोड़ जाता है और वह भी तब जब आप एक ऐसे परिवर्तन से गुजर रहे हो जहाँ आपके हार्मोन्स में एक जबरदस्त चेंज होता है और आप लड़कपन से यौवन की तरफ अग्रसर होते हो।
एक बच्चा - स्कूल तक एक कच्ची मिट्टी की तरह होता - और जब वो कॉलेज जाने लगता है तब उसपर विशेष ध्यान देने की जरुरत होती है। यहाँ उसे एक अच्छे दोस्त और दिशा निर्देशक की बहुत जरुरत होती है। एक गलत कदम उसे जिंदगी भर के लिए एक ऐसी स्थिति में ला देता है की फिर आप कितने भी अच्छे काम करो और कुछ भी करो उस गलती का अहसाह आपको खुद भी होता है और कुछ लोग ऐसे होते है जो उन बातों को बार बार हर जगह समाज में आपको निचा दिखने के लिए करते है और हाँ ऐसा करते समय वो अपनी गलतियों को इस खूबसूरती से छुपा जाते है की सब को भरोसा हो जाता है की गलती सिर्फ और सिर्फ दूसरे की है।
कहते है की एक बच्चा अच्छी आदत देरी से और प्रयत्नों से सीखता है और बुरी आदत वह अपने बड़ों को अनुसरण करते हुए खुद ही सिख जाता है।
मेरा स्वाभाव एक खोजी प्रकृति का था और है , मैं हमेशा किसी भी मशीन में क्या खराबी हो सकती है उसके पीछे अपना दिमांग लगता था - मैंने सभी तरह के रेडिओ, चाभी भरने वाले ग़र्मोफोन ,वो काली HMV की L . P . DISC जिसे रिकॉर्ड कहते थे , पुराना टेप रिकॉर्डर, कैसेट टेप रिकॉर्डर , वाल्व टाइप कंप्यूटर , उसकी वो बड़ी वाली फ्लॉपी डिस्क , फिर मध्यम फ्लॉपी डिस्क फिर कॉम्पैक्ट फ्लॉपी, C .D .DRIVE , पेन ड्राइव , 386, 486, PENTIUM, PENTIUM -1 TO PENTIUM -5 और अब LAP -TOP सभी खोले है और कुछ को रिपेयर भी किया है। अधिकतर तो ख़राब ही हुए है और ख़राब भी ऐसे की कबाड़ी हाथ नहीं लगते थे।



दोस्तों आप सोचते होंगे कि ये आदमी सिर्फ अपनी तारीफ ही करता रहता है क्या करूँ भटक जाता हूँ.
हाँ तो दोस्तों मैं बता रहा था मेरी खोजी आदत के बारे में. - मैं अपने शारीरिक बदलावों को खेल के मैदान में संगठित कर रहा था की मुझे एक दिन बाथरूम में एक किताब मिली जिसे किसी ने छुपा कर रखा था, वह एक अश्लील साहित्य था जिसे मेरे बड़े भाई ने वहां पर छुपा कर रखी थी ( इसका पता मुझे बाद में पड़ा ) धीरे धीरे मैं ऐसी किताबों की खोज में रहता था और उक्सुकता वश उन्हें पढता भी था। मुझे पता नहीं एक अजीब सा आनंद आता था। मैंने इसकी कभी शिकायत नहीं की और पढ़ कर उन किताबों को चुप चाप वहीँ वापस रख देता था.
१९७४ में मेरे भाई का विवाह एक पैसे वाले परिवार की बड़ी लड़की से हो गई. और यहीं से हमारे घर में एक अजीब सा वातावरण रहने लग गया। एक तनाव , एक खिचाव - पता नहीं क्या और क्यों।
भाई के विवाह के समय पिताजी ने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया और इस चक्कर में उन्होंने एक ऐसे आदमी से लोन लिया जिसने पिताजी की पूरी जिंदगी तबाह कर दी. इसके बारे में कभी विस्तार से बताऊंगा।
घर की कलह को देखते हुए १७ साल की छोटी उम्र में ही मेरी बहन की शादी १९७६ में दिल्ली के एक पैसे वाले हरियाणवी परिवार में कर दी गई जो की आगे चल कर हमारे परिवार की एक और गलती के रूप में सामने आई. किसी दिन बहन के बारे में भी बताऊंगा।
घर में दादीजी और भाभी का एक ग्रुप बन गया था और माँ को कई तरह से परेशान करने लगे थे। मैं माँ की तरफ था। भाई उस समय CA की पढाई कर रहा था और आर्टिकल शिप में किसी CA के यहाँ जाता था. पिताजी उन दिनों कुछ थके थके और चड़चिड़े से हो गए थे - अब समझ में आता है की उनकी ऐसी हालत के पीछे भाई के विवाह के समय में लिया गया लोन और उससे उत्पन्न परिस्थितियां थी.
जैसा की मैंने बताया की मैं एक खुराफाती दिमाग का लड़का था और रेडिओ असेम्बली सीखता था तो मैंने घर की फ़ोन लाइन में से एक लाइन निकल कर उसे टेप रिकॉर्डर से कनेक्ट करके रिकॉर्ड करने का सिस्टम बना लिया था और उससे भाभी और उनकी माँ एवं एक खास दोस्त थी जो भाभी को काफी उल्टा सीधा सिखाया करती थी , उनकी बातों को रिकॉर्ड करके माँ को सुनाया करता था।
दोस्तों कुछ बातें भूलना अच्छा होता परन्तु समयचक्र के कुछ पन्ने कभी कभी याद कर लेना चाहिए
मेरी यह कहानी किसी को बदनाम या अपने को पाक साफ करने या बताने के लिए नहीं लिख रहा हूँ यह तो मन का भाव है और जो एक तरफ की बातों को सुन कर अपना निर्णय बना लेते हैं उन्हें - यदि वो इसे पढ़े - तो यह बताने की कोशिश है की सब एक तरफ़ा नहीं होता जनाब - हर कोई कभी न कभी गलती करता है - आपको उसके अत्तीत से नहीं उसके वर्तमान के चरित्र और कार्यों को देखें और अपना निष्कर्ष खुद निकालें -नकारात्मक, कुंठित और खुद के तरीके से दुनिया को चलने वाले की सुनने के बजाय अपना दिमाग और अक्ल लगाना चाहिए।
दोस्तों आगे की कहानी फिर कभी -
नमस्ते
कैसे हो आप सब - जरूर कुशल होंगें - यह भी कोई पूछने की बात है।
दोस्तों अलग अलग समय काल में आपके अलग अलग दोस्त होते है और आप अलग अलग मनःस्थिति में रहते हो। आपके सोचने का स्तर और दिशा भी आपके उस समय के सामाजिक परिवेश , दोस्तों और अंतरंग लोगों के व्यवहार पर निर्भर करता है।
परिवार के लोगों का आपके साथ आचरण आपके ऊपर एक अमिट छाप छोड़ जाता है और वह भी तब जब आप एक ऐसे परिवर्तन से गुजर रहे हो जहाँ आपके हार्मोन्स में एक जबरदस्त चेंज होता है और आप लड़कपन से यौवन की तरफ अग्रसर होते हो।
एक बच्चा - स्कूल तक एक कच्ची मिट्टी की तरह होता - और जब वो कॉलेज जाने लगता है तब उसपर विशेष ध्यान देने की जरुरत होती है। यहाँ उसे एक अच्छे दोस्त और दिशा निर्देशक की बहुत जरुरत होती है। एक गलत कदम उसे जिंदगी भर के लिए एक ऐसी स्थिति में ला देता है की फिर आप कितने भी अच्छे काम करो और कुछ भी करो उस गलती का अहसाह आपको खुद भी होता है और कुछ लोग ऐसे होते है जो उन बातों को बार बार हर जगह समाज में आपको निचा दिखने के लिए करते है और हाँ ऐसा करते समय वो अपनी गलतियों को इस खूबसूरती से छुपा जाते है की सब को भरोसा हो जाता है की गलती सिर्फ और सिर्फ दूसरे की है।
कहते है की एक बच्चा अच्छी आदत देरी से और प्रयत्नों से सीखता है और बुरी आदत वह अपने बड़ों को अनुसरण करते हुए खुद ही सिख जाता है।
मेरा स्वाभाव एक खोजी प्रकृति का था और है , मैं हमेशा किसी भी मशीन में क्या खराबी हो सकती है उसके पीछे अपना दिमांग लगता था - मैंने सभी तरह के रेडिओ, चाभी भरने वाले ग़र्मोफोन ,वो काली HMV की L . P . DISC जिसे रिकॉर्ड कहते थे , पुराना टेप रिकॉर्डर, कैसेट टेप रिकॉर्डर , वाल्व टाइप कंप्यूटर , उसकी वो बड़ी वाली फ्लॉपी डिस्क , फिर मध्यम फ्लॉपी डिस्क फिर कॉम्पैक्ट फ्लॉपी, C .D .DRIVE , पेन ड्राइव , 386, 486, PENTIUM, PENTIUM -1 TO PENTIUM -5 और अब LAP -TOP सभी खोले है और कुछ को रिपेयर भी किया है। अधिकतर तो ख़राब ही हुए है और ख़राब भी ऐसे की कबाड़ी हाथ नहीं लगते थे।



दोस्तों आप सोचते होंगे कि ये आदमी सिर्फ अपनी तारीफ ही करता रहता है क्या करूँ भटक जाता हूँ.
हाँ तो दोस्तों मैं बता रहा था मेरी खोजी आदत के बारे में. - मैं अपने शारीरिक बदलावों को खेल के मैदान में संगठित कर रहा था की मुझे एक दिन बाथरूम में एक किताब मिली जिसे किसी ने छुपा कर रखा था, वह एक अश्लील साहित्य था जिसे मेरे बड़े भाई ने वहां पर छुपा कर रखी थी ( इसका पता मुझे बाद में पड़ा ) धीरे धीरे मैं ऐसी किताबों की खोज में रहता था और उक्सुकता वश उन्हें पढता भी था। मुझे पता नहीं एक अजीब सा आनंद आता था। मैंने इसकी कभी शिकायत नहीं की और पढ़ कर उन किताबों को चुप चाप वहीँ वापस रख देता था.
१९७४ में मेरे भाई का विवाह एक पैसे वाले परिवार की बड़ी लड़की से हो गई. और यहीं से हमारे घर में एक अजीब सा वातावरण रहने लग गया। एक तनाव , एक खिचाव - पता नहीं क्या और क्यों।
भाई के विवाह के समय पिताजी ने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च किया और इस चक्कर में उन्होंने एक ऐसे आदमी से लोन लिया जिसने पिताजी की पूरी जिंदगी तबाह कर दी. इसके बारे में कभी विस्तार से बताऊंगा।
घर की कलह को देखते हुए १७ साल की छोटी उम्र में ही मेरी बहन की शादी १९७६ में दिल्ली के एक पैसे वाले हरियाणवी परिवार में कर दी गई जो की आगे चल कर हमारे परिवार की एक और गलती के रूप में सामने आई. किसी दिन बहन के बारे में भी बताऊंगा।
घर में दादीजी और भाभी का एक ग्रुप बन गया था और माँ को कई तरह से परेशान करने लगे थे। मैं माँ की तरफ था। भाई उस समय CA की पढाई कर रहा था और आर्टिकल शिप में किसी CA के यहाँ जाता था. पिताजी उन दिनों कुछ थके थके और चड़चिड़े से हो गए थे - अब समझ में आता है की उनकी ऐसी हालत के पीछे भाई के विवाह के समय में लिया गया लोन और उससे उत्पन्न परिस्थितियां थी.
जैसा की मैंने बताया की मैं एक खुराफाती दिमाग का लड़का था और रेडिओ असेम्बली सीखता था तो मैंने घर की फ़ोन लाइन में से एक लाइन निकल कर उसे टेप रिकॉर्डर से कनेक्ट करके रिकॉर्ड करने का सिस्टम बना लिया था और उससे भाभी और उनकी माँ एवं एक खास दोस्त थी जो भाभी को काफी उल्टा सीधा सिखाया करती थी , उनकी बातों को रिकॉर्ड करके माँ को सुनाया करता था।
दोस्तों कुछ बातें भूलना अच्छा होता परन्तु समयचक्र के कुछ पन्ने कभी कभी याद कर लेना चाहिए
मेरी यह कहानी किसी को बदनाम या अपने को पाक साफ करने या बताने के लिए नहीं लिख रहा हूँ यह तो मन का भाव है और जो एक तरफ की बातों को सुन कर अपना निर्णय बना लेते हैं उन्हें - यदि वो इसे पढ़े - तो यह बताने की कोशिश है की सब एक तरफ़ा नहीं होता जनाब - हर कोई कभी न कभी गलती करता है - आपको उसके अत्तीत से नहीं उसके वर्तमान के चरित्र और कार्यों को देखें और अपना निष्कर्ष खुद निकालें -नकारात्मक, कुंठित और खुद के तरीके से दुनिया को चलने वाले की सुनने के बजाय अपना दिमाग और अक्ल लगाना चाहिए।
दोस्तों आगे की कहानी फिर कभी -
नमस्ते
Sunday, May 10, 2020
मेरी दादीजी
नमस्कार
दोस्तों ,
आशा
ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप
सब सकुशल होंगें। आप
सब से निवेदन है
की सामाजिक नियमों का पालन करते
हुए अपने और अपने प्रिय
जनों के स्वस्थ का
सम्पूर्ण ध्यान रखें।
दोस्तों,
मुझे करीब १० से १२
दिन हो गए यहाँ
कुछ लिखे हुए और उसका कारण है
मेरे मन की दुविधा।
दोस्तों,
स्कूल टाइम तक तो सब
ठीक था और सच
कहूं तो मैं इतना
छोटा था कि मुझे
दुनियादारी का इतना अहसास
न तो हुआ और
न ही कभी होने
दिया गया। घर
का छोटा बेटा था और बहुत
ज्यादा सब से घुलता
मिलता नहीं था तो मुझे
बच्चा ही माना जाता
रहा और घर के
किसी फैसले में मुझे शामिल ही नहीं किया
जाता था और मुझे
भी इस बात से
ज्यादा कोई मतलब ही रहा। मैं तो अपने में
ही मस्त और व्यस्त रहता
था।
दोस्तों,
अपनी सत्य कथा लिखते हुए शायद कहीं ऐसा भी हो सकता
है कि मैं दूसरे
पक्ष के विचारों को
ठीक से न बता
पाऊ तो मुझे माफ़
करियेगा।
दरअसल
वर्ष १९७४ की अप्रैल में
मेरे बड़े भाई का विवाह हुआ
और वहीँ से हम लोगों
के (हमारे परिवार के ) सुख शांति में क्रमशः
कमी आनी शुरू
हो गई - यह सच्चाई है
- कोई माने या ना माने।
चार
रूम और बड़ा हॉल
, बालकनी, दो बाथरूम, लॉफ्ट,
किचन, दो एंट्रेंस , फ़ोन,
गाड़ी, समय के हिसाब से
भरपूर घर था - मुंबई
में आज के दिन
हम मध्यम वर्गी - ईमानदार व्यक्ति सोच भी नहीं सकता।
यहाँ
मैं मेरी दादीजी, माँ, बाबूजी, मेरा भाई, और मेरी बहन
बड़े ही आराम से
रहते थे।
दोस्तों
जब दादीजी का जिक्र आ
गया तो मैं उनके
बारे में कुछ कहना चाहूंगा - उम्मीद है आप भी
इसे जानना चाहेंगे।
मेरे
दादाजी ने चार शादियां
की थी और मेरी
दादी चौथी थी। दादीजी
के पहले वाली सभी डिलीवरी के समय गुजर
गई थी ऐसा बताया
जाता है। उस
समय मेडिकल साइंस इतना
विकसित नहीं था। मेरी
दादी से दो बच्चे
हुए -पिताजी (जिन्हे हम बाबूजी कहते
हैं ) और एक लड़की
( मेरी भुआ सुशीला ) - इनका
भी देहांत छोटी उम्र में ही हो गया
था। पिताजी
जब ४ साल के
थे तभी मेरे दादाजी का कैंसर की
बीमारी से स्वर्गवास हो
गया था।
पिताजी
के चाचा लोगों (मेरे
दादाजी ९ भाई थे
और २ बहनें ) ने
पिताजी को बहुत दुःख
दिए यहाँ तक की एक
बार जहर भी दे दिया
था। किसी तरह दादीजी को पता चला
और पिताजी को बचा लिया
गया। दादीजी पिताजी
को लेकर अपने मायके चली गई और काफी
समय वहां रहीं। इन सब बातों
का उनके स्वस्थ पर काफी असर
हुआ और वो बीमार
ही रहती थी। माँ
बताती हैं की उन्हें दिन
में दो से तीन
बार मॉर्फिन के
इंजेक्शन लगाए जाते थे , इस इंजेक्शन की
उन्हें आदत हो गई थी
। धीरे
धीरे पिताजी
ने उन्हें डबल डिस्टिल्ड वाटर के इंजेक्शन देने
शुरू किये। कुछ
समय तो चलता रहा
- माँ और पिताजी खुद
ही इंजेक्शन दे दिया करते
थे। जब
दादीजी को किसी तरह
मालूम पड़ा तो फिर एक
कैप्सूल - नाम भूल रहा हूँ - चालू किये। कुछ
दिनों बाद पिताजी ने कैप्सूल में
से दवाई निकाल कर
उसमे ग्लूकोस पाउडर भरना शुरू किया। एक
दिन एक कैप्सूल मुँह
में खुल गया तो फिर हंगामा
हो गया - फिर एक दवाई आती
थी सोनलगिन टेबलेट्स (आजकल
तो वो बंद हो
गई है , मुझे यादहै पिंक कलर की गोली होती
थी और एल्युमीनियम की
डब्बी में आती थी ) उसे कई दिनों तक
लेती थी और जब
वो बंद हो गई तो
कॉम्पोसे टेबलेट्स लास्ट तक लेती थी।
दोस्तों
ये अतीत भी क्या चीज
है कहाँ से कहाँ ले
जाती है.
हाँ
तो मेरी दादीजी बहुत ही पुराने ख्यालात की
थी और रसोई में
उनके नियम बहुत ही कड़क थे.
उनकी माँ से कम ही
बनती थी। दोनों
में एक अदृश्य सा
तनाव महसूस किया जा सकता था। मेरी
उम्र उतनी तो नहीं थी
की मैं जज कर सकूँ
की कौन सही है कौन गलत
परन्तु दादीजी के कई नियमों
से सब परेशान रहते
थे। वैसे
दादीजी बड़े ही खुशमिजाज रहती
थी या रहने का
प्रयास करती थी। मैं
तो उनसे बड़ी मस्ती करता था। उन्हें
अपने मायके के
लोगों को सामान और
पैसे देना अच्छा लगता था। उनकी
अलमारी भरी पड़ी रहती थी एक सामान
निकालो तो पांच सामान
गिरते थे। एकदम
अनपढ़ थी परन्तु दवाइयों
को उनके पैकिंग से बराबर पहचान
लेती थी
एक
मजेदार बात याद आई है सोचा
बता ही दूँ - एक
बार हमारे ड्राइवर को दस्त लगने
शुरू हुए तो उसने दादीजी
को कहा - दादीजी ने उसे chlorostep tabs (शायद अब
बंद हो गई है
) दे दी - ड्राइवर दादीजी के पास ३
दिन बाद फिर आया और हाथ जोड़
कर बोला - माजी (दादीजी को
सब माजी ही कहते थे
)- मुझे ३ दिनों से दस्त नहीं
हो रहा अब कोई ऐसी
दवाई दीजिये की पेट साफ़
हो .
दोस्तों
आज बस इतना ही
- जल्दी ही आऊंगा
- कंटिन्यू करने -
धन्यवाद
खुश
रहें मस्त रहें नमस्ते
Wednesday, April 29, 2020
मेरा बचपन
आज मैं आप लोगों को मेरे बचपन की कुछ खट्टी मीठी बातें बताने गए रहा हूँ।
जैसा की मैंने पहले भी बताया है कि मैं बहुत शर्मीला लड़का था। मैं खाने में भी बहुत ही कम सब्जियां खाता था, फल तो मैं अभी तक नहीं खाता सिर्फ हापुस आम को छोड़ कर। मैंने आम भी मेरे ख्याल से कुछ आठ दस साल पहले ही खाना शुरू किया है. इस बात को लेकर मेरे बारे में बहुत ही बातें होती है और आज भी मुझे दावत पर बुलाने के समय लोगों को मेरी खाने की पसंद को ध्यान में रखना होता है।
मेरी माँ बताया करती हैं कि मेरे बड़े मामाजी - गोपाल मामाजी - काफी कोशिश करते थे मुझे आम और फल और सब्जियां खिलने की परन्तु मैं कभी भी नहीं खा पाया। मुझे उल्टियां हो जाया करती थी। एक तो आलू मुझे अत्यंत ही प्रिय है. इसे किसी भी तरह - तल के , भून के, सब्जी में , पराठा में , पापड़ में , हलुए में , यानि की कैसे भी आलू दे दो मेरा काम हो जायेगा। मैं कोई भी हरी सब्जिया नहीं खाता , ककड़ी, टमाटर, गाजर, आदि भी नहीं खता था - नहीं खता हूँ अभी भी। मुझे बटर, चीज़, मिर्च मसाला,तीखा चटपटा ऐसी चीजें बहुत ही पसंद है। मीठा तो मुझे चाहिए ही।
बचपन में मुझे गुल्ली डंडा , सात पिट्टू , पकड़ा पकड़ी, और कंचे आदि हिंदुस्तानी खेल बहुत पसंद थे। कई बार मुझे चोटें भी आई और मेरी आँखों के पास तीन बार बड़ी चोटें आई जिसमे काम से काम दो बार टांके भी लगवाने पड़े. मैं चोट का बड़ा पक्का था मुझे दर्द का अहसास काम ही होता था - या यूँ कहें की मुझमे दर्द सहने की ज्यादा शक्ति थी। शरीर से गोलमटोल होने के बावजूद मेरी हड्डियां मजबूत थी। मैं तो बताना ही भूल गया की स्कूल में मुझे मेरे साथी - हाथी कह कर बुलाते थे और मुझे बड़ा मजा आता था।
![]() |
| गुल्ली डंडा |
![]() |
| सात पिट्टू |
![]() |
| कंचे |
जैसे जैसे बड़े होने लगे खेलों की पसंद बदल गई यह "खो खो " "कबड्डी" में कब बदल गई पता भी नहीं पड़ा.
१०वी के पास आते आते फुट बॉल, का दीवाना हो गया, स्कूल के वार्षिक खेल उत्सव में मैं - १०० मीटर , २०० मीटर, रिले रेस , SHOT PUT , भाला फेक (JAVELIN THROW ) और कॉलेज में तो FOOT BALL , क्रिकेट के साथ साथ टेबल टेनिस को बड़े ही अच्छे से खेलता था. - कॉलेज के दिनों में मैं नौका चलन (ROWING)भी करता था - शरीर काफी तंदुरुस्त रहा करता था - मैंने किसी भी खेल में कोई पदक नहीं लिए --परन्तु हिस्सा जरूर लेता था. फुटबॉल खेलते समय घुटनों पर बहुत चोट खाई थी जिसका दर्द अब इस उम्र में महसूस होता है. उस समय इतने पैड्स नहीं होते थे।
घर में भाई के साथ शतरंज खेलता था जो हमेशा झगडे पर ख़तम होती थी - माँ उसे झगडे की जड़ कहा करती थी मुझे याद नहीं कभी भी हमारा गेम पूरा हुआ करता था। पिताजी के साथ कभी कभी चौपड़ भी खेल लेते थे हम लोग। कभी कभी ताश भी खेल लिया करते थे - बहुत कम।
कॉलेज के दिनों में ही मैंने रेडिओ असेम्बली की क्लास की, उन्ही दिनों मैंने ड्राइविंग भी सीखी - मैंने करीब १९७६-७७ तक बहुत मजे किये कई तरह की एक्टिविटी की। कॉलेज में पब्लिक बस में फुट स्टेप पर लटक के जाना, कॉलेज के क्लब रूम में मस्ती करना - कैंटीन में मस्ती करना - आदि आदि।
आज बस इतना ही - जल्द ही आगे की यादों को लिखने बैठुंगा
शुभ रात्रि --- जय हिन्द।
Sunday, April 26, 2020
some memories of Adarsh Hindi High School
Hello friends ,
How are you, hope you are good. Follow social distance and stay healthy.
Yesterday I told you some stories about my first school. Today I will tell you about my second school "Adarsh Hindi High School".
When my family shifted house, my school also had to change. At some distance from my house, there was a school called "Adarsh Hindi High School". I took admission in class 9th. At that time we had to choose our subjects and I chose PHYSICS, CHEMISTRY, and MATHEMATICS along with COMPULSORY LANGUAGE / SUBJECTS. I wanted to become a SCIENTIST / ENGINEER. One of my maternal uncles (mother's brother) was a professor of ATOMIC PHYSICS in America and I also wanted to go and study abroad, which could not be done - well, leave that.
Yes, in our new school, the girls used to take classes in the morning and after cleanliness, our classes used to be from 10.30 am to 5.00 pm, there was lunch break at 2.00 and there was attendance again at 2.30.
All was well for about 12 or 18 months - in those days school used to be only till 11th and after that there were BOARD EXAMS and passing that we had to go to college - it was 11 + 3 year system as against 10 + 2 + 2 . So I had to spend only 3 years in this school - And 10th and 11th students used to be senior Boys
There was a theater near our school. Our head teacher was a patient of blood pressure - I remember that sometimes after first class -we used to go to the nearby cinema hall to see the movie by giving money to the watchman and then after lunch we used to attend class with all the children, Sometimes when caught, we were taken to the head teacher. We knew he had a heart problem, we used to come out by making some or other excuses.
We were fine in studies and also participated in other school programs, so we were famous in school.
Some of my friends met me a few years ago via FACEBOOK, thanks to Surbir - who called me after seeing my profile. Kamal Sinha was a special friend of my school time - Surbir spoke to me and we still talk sometimes. Another friend was Nityananda Sharma - he is Lefty . Kamal and Nityananda used to come my home and had good image with my parents
In this school, the focus was more on studying because after 11th we had to appear in the BOARD EXAMS and we could not afford to have much fun.
When I was in class 11, Saraswati Puja was organized in our school - at the time of immersion of the Saraswati idol - we were seniors so we had to go BUT for me it was necessary to reach home before 8 o'clock. We were late during immersion process and it was about 10 o'clock - I was very scared that I would be beaten up very badly at home - I told Nityananda that he should accompany me to my house - My family considered Nityanad to be a good boy and in reality he was quite responsible too - when we reached the door and rang the bell, Dad opened the door - Before opening the door Dad saw from the view hole - and I heard a sound as if something was banged / dropped near the gate - the door opened. Dad was calm on seeing Nityananda - but I saw that there was a slipper near the door - single - that was the thing which was dropped and i heard the sound - and with which I had to be welcomed - all the people of the house were standing and awaiting - what will happen now - But I survived because of Nityananda. - Thanks brother.
EXAMS of our school completed in December - we used to get three months to prepare.my father arranged one Tution teachers used to come to the house to help me during my studies.
Friends, even today I have the board's marksheet and certificate.
Friends, we used to have a kind of fun in school, but when we were at home, the fun was different.
In the next blog, I will try to write about the fun of some home locality.
Thank you for joining me.
How are you, hope you are good. Follow social distance and stay healthy.
Yesterday I told you some stories about my first school. Today I will tell you about my second school "Adarsh Hindi High School".
When my family shifted house, my school also had to change. At some distance from my house, there was a school called "Adarsh Hindi High School". I took admission in class 9th. At that time we had to choose our subjects and I chose PHYSICS, CHEMISTRY, and MATHEMATICS along with COMPULSORY LANGUAGE / SUBJECTS. I wanted to become a SCIENTIST / ENGINEER. One of my maternal uncles (mother's brother) was a professor of ATOMIC PHYSICS in America and I also wanted to go and study abroad, which could not be done - well, leave that.
Yes, in our new school, the girls used to take classes in the morning and after cleanliness, our classes used to be from 10.30 am to 5.00 pm, there was lunch break at 2.00 and there was attendance again at 2.30.
All was well for about 12 or 18 months - in those days school used to be only till 11th and after that there were BOARD EXAMS and passing that we had to go to college - it was 11 + 3 year system as against 10 + 2 + 2 . So I had to spend only 3 years in this school - And 10th and 11th students used to be senior Boys
There was a theater near our school. Our head teacher was a patient of blood pressure - I remember that sometimes after first class -we used to go to the nearby cinema hall to see the movie by giving money to the watchman and then after lunch we used to attend class with all the children, Sometimes when caught, we were taken to the head teacher. We knew he had a heart problem, we used to come out by making some or other excuses.
We were fine in studies and also participated in other school programs, so we were famous in school.
Some of my friends met me a few years ago via FACEBOOK, thanks to Surbir - who called me after seeing my profile. Kamal Sinha was a special friend of my school time - Surbir spoke to me and we still talk sometimes. Another friend was Nityananda Sharma - he is Lefty . Kamal and Nityananda used to come my home and had good image with my parents
In this school, the focus was more on studying because after 11th we had to appear in the BOARD EXAMS and we could not afford to have much fun.
When I was in class 11, Saraswati Puja was organized in our school - at the time of immersion of the Saraswati idol - we were seniors so we had to go BUT for me it was necessary to reach home before 8 o'clock. We were late during immersion process and it was about 10 o'clock - I was very scared that I would be beaten up very badly at home - I told Nityananda that he should accompany me to my house - My family considered Nityanad to be a good boy and in reality he was quite responsible too - when we reached the door and rang the bell, Dad opened the door - Before opening the door Dad saw from the view hole - and I heard a sound as if something was banged / dropped near the gate - the door opened. Dad was calm on seeing Nityananda - but I saw that there was a slipper near the door - single - that was the thing which was dropped and i heard the sound - and with which I had to be welcomed - all the people of the house were standing and awaiting - what will happen now - But I survived because of Nityananda. - Thanks brother.
EXAMS of our school completed in December - we used to get three months to prepare.my father arranged one Tution teachers used to come to the house to help me during my studies.
Friends, even today I have the board's marksheet and certificate.
Friends, we used to have a kind of fun in school, but when we were at home, the fun was different.
In the next blog, I will try to write about the fun of some home locality.
Thank you for joining me.
स्कूल की यादों की दूसरी क़िस्त - आदर्श हिंदी हाई स्कूल
नमस्कार दोस्तों ,
कैसे हो, आशा करता हूँ की अच्छे होगें। सामाजिक दुरी का पालन करें और स्वस्थ रहें।
कल मैंने आपको अपनी पहली स्कूल के कुछ किस्से बताये थे। आज मैं आपको मेरे दूसरे स्कूल " आदर्श हिंदी हाई स्कूल " के बारे में बताऊंगा।
जब मेरे परिवार ने घर बदला तो मेरा स्कूल भी बदलना पड़ा। मेरे घर के कुछ दुरी पर एक स्कूल था जिसका नाम " आदर्श हिंदी हाई स्कूल " था मैंने उसमे ९वी क्लास में एडमिशन लिया। उस समय हमे अपने विषय चुनने होते थे और मैंने COMPULSORY LANGUAGE / SUBJECTS के साथ PHYSICS , CHEMISTRY , और MATHEMATICS को चुना। मैं SCIENTIST / ENGINEER बनना चाहता था। मेरे एक मामा ( माँ का भाई) ATOMIC PHYSICS का प्रोफेसर था अमेरिका में और मैं भी विलायत जा कर पढ़ना चाहता था जो नहीं हो सका - खैर छोड़ो उस बात को।
हाँ तो हमारे इस नए स्कूल में सुबह लड़कियों को क्लासेज लगती थी और साफ़ सफाई के बाद १० .३० बजे से ५.०० बजे तक हमारी क्लासेज लगती थी २.०० को लंच ब्रेक होता था और २.३० को दोबारा अटेंडेंस होती थी.
करीब १२ या १८ महीनों तक तो सब ठीक था - यहाँ बतादूँ कि स्कूल सिर्फ ११ वी तक ही हुआ करती थी और उसके बाद बोर्ड के EXAMS होते थे और हमें कॉलेज में जाना होता था - अतः मुझे इस स्कूल में केवन ३ साल ही बिताना था - और १०वी और ११वी के स्टूडेंट्स सीनियर हो जाते थे -
हमारे स्कूल के पास एक सिनेमाघर था. हमारा प्रधान अध्यापक ब्लड प्रेशर का मरीज था - मुझे याद है की मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ कभी कभी पहली क्लास करके - वॉचमैन को पैसा दे कर स्कूल से निकल जाते थे और पास के सिनेमा हॉल में जा कर मूवी दिखा करते थे और फिर लंच में सब बच्चों के साथ क्लास अटेंड करते थे, कभी कभी जब पकडे जाते तो प्रधान अध्यापक के सामने लाये जाते। हमें पता था की उन्हें हार्ट की प्रॉब्लम है , हम ऐसा नाटक करते थे की वो हमें छोड़ देते थे.
हम पढाई में ठीक थे और स्कूल के अन्य कार्यक्रम में भी हिस्सा लेते थे इसलिए हम स्कूल में फेमस थे.
मेरे कुछ दोस्त मुझे कुछ सालो पहले FACEBOOK के जरिये मिले , थैंक्स तो सूरबीर - जिसने मेरी प्रोफाइल देखकर मुझे फ़ोन किया। मेरे स्कूल के समय का एक खास दोस्त था कमल सिन्हा - सूरबीर ने मेरी और उसकी बात कराइ हम आज भी कभी कभी बात कर लेते हैं. एक और दोस्त था नित्यानंद शर्मा - लेफ्टि था. कमल और नित्यानंद का घर पर आना जाना था
इस स्कूल में ज्यादा ध्यान पढाई पर ही रहता था क्योंकि ११ वी के बाद बोर्ड के EXAMS थे और हम ज्यादा मस्ती नहीं कर सकते थे.
११ वी क्लास की बात है हमारे स्कूल में सरस्वती पूजा का आयोजन किया गया - सरस्वती मूर्ति के विसर्जन के समय - हमलोग सीनियर थे इसलिए हमे जाना था और मेरे घर में ८ बजे के पहले हर हाल में घर पहुंचना जरुरी था। हमें विसर्जन में देर हो गई करीब १० बज गए- मैं बहुत डरा हुआ था की घर पर बहुत पिटाई होगी - मैंने नित्यानंद को कहा की वो मेरे साथ मेरे घर चले - मेरे घर वाले नित्यानद को एक अच्छा लड़का मानते थे और सच में वह काफी जिम्मेदार था भी - जब हम गर पहुंचे और घंटी बजाई तो पिताजी ने दरवाजा खोला - दरवाजा खोलने से पहले पिताजी ने व्यू होल से देखा - और मैंने एक आवाज सुनी जैसे किसीने कुछ ऊपर से पटका हो - दरवाजा खुला तो पिताजी नित्यानंद को देखकर शांत होगये थे - पर मैंने देखा की दरवाजे के पास एक चप्पल पड़ी थी - सिंगल - यही वो चीज थी जिसकी आवाज मैंने सुनी थी - और जिससे मेरा स्वागत होना था - घर के सभी लोग ऐसे खड़े थे की अब क्या होगा - परन्तु नित्यानंद की वजह से मैं बच गया. - थैंक्स भाई।
दिसंबर में हमारे स्कूल के EXAMS पुरे हुए - हमे तीन महीनों का समय मिलता था तैयारी के लिए। घर पर टूशन टीचर आते थे।
दोस्तों आज भी मेरे पास बोर्ड की मार्कशीट और सर्टिफिकेट है.
दोस्तों स्कूल में तो हम एक तरह की मस्ती करते थे परन्तु जब घर पर होते थे तो मस्ती अलग तरह की होती थी
अगले ब्लॉग में कुछ घर मोहल्ले की मस्ती के बारे में लिखने का प्रयास करूँगा।
मेरे साथ जुड़न के लिए धन्यवाद्।
कैसे हो, आशा करता हूँ की अच्छे होगें। सामाजिक दुरी का पालन करें और स्वस्थ रहें।
कल मैंने आपको अपनी पहली स्कूल के कुछ किस्से बताये थे। आज मैं आपको मेरे दूसरे स्कूल " आदर्श हिंदी हाई स्कूल " के बारे में बताऊंगा।
जब मेरे परिवार ने घर बदला तो मेरा स्कूल भी बदलना पड़ा। मेरे घर के कुछ दुरी पर एक स्कूल था जिसका नाम " आदर्श हिंदी हाई स्कूल " था मैंने उसमे ९वी क्लास में एडमिशन लिया। उस समय हमे अपने विषय चुनने होते थे और मैंने COMPULSORY LANGUAGE / SUBJECTS के साथ PHYSICS , CHEMISTRY , और MATHEMATICS को चुना। मैं SCIENTIST / ENGINEER बनना चाहता था। मेरे एक मामा ( माँ का भाई) ATOMIC PHYSICS का प्रोफेसर था अमेरिका में और मैं भी विलायत जा कर पढ़ना चाहता था जो नहीं हो सका - खैर छोड़ो उस बात को।
हाँ तो हमारे इस नए स्कूल में सुबह लड़कियों को क्लासेज लगती थी और साफ़ सफाई के बाद १० .३० बजे से ५.०० बजे तक हमारी क्लासेज लगती थी २.०० को लंच ब्रेक होता था और २.३० को दोबारा अटेंडेंस होती थी.
करीब १२ या १८ महीनों तक तो सब ठीक था - यहाँ बतादूँ कि स्कूल सिर्फ ११ वी तक ही हुआ करती थी और उसके बाद बोर्ड के EXAMS होते थे और हमें कॉलेज में जाना होता था - अतः मुझे इस स्कूल में केवन ३ साल ही बिताना था - और १०वी और ११वी के स्टूडेंट्स सीनियर हो जाते थे -
हमारे स्कूल के पास एक सिनेमाघर था. हमारा प्रधान अध्यापक ब्लड प्रेशर का मरीज था - मुझे याद है की मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ कभी कभी पहली क्लास करके - वॉचमैन को पैसा दे कर स्कूल से निकल जाते थे और पास के सिनेमा हॉल में जा कर मूवी दिखा करते थे और फिर लंच में सब बच्चों के साथ क्लास अटेंड करते थे, कभी कभी जब पकडे जाते तो प्रधान अध्यापक के सामने लाये जाते। हमें पता था की उन्हें हार्ट की प्रॉब्लम है , हम ऐसा नाटक करते थे की वो हमें छोड़ देते थे.
हम पढाई में ठीक थे और स्कूल के अन्य कार्यक्रम में भी हिस्सा लेते थे इसलिए हम स्कूल में फेमस थे.
मेरे कुछ दोस्त मुझे कुछ सालो पहले FACEBOOK के जरिये मिले , थैंक्स तो सूरबीर - जिसने मेरी प्रोफाइल देखकर मुझे फ़ोन किया। मेरे स्कूल के समय का एक खास दोस्त था कमल सिन्हा - सूरबीर ने मेरी और उसकी बात कराइ हम आज भी कभी कभी बात कर लेते हैं. एक और दोस्त था नित्यानंद शर्मा - लेफ्टि था. कमल और नित्यानंद का घर पर आना जाना था
इस स्कूल में ज्यादा ध्यान पढाई पर ही रहता था क्योंकि ११ वी के बाद बोर्ड के EXAMS थे और हम ज्यादा मस्ती नहीं कर सकते थे.
११ वी क्लास की बात है हमारे स्कूल में सरस्वती पूजा का आयोजन किया गया - सरस्वती मूर्ति के विसर्जन के समय - हमलोग सीनियर थे इसलिए हमे जाना था और मेरे घर में ८ बजे के पहले हर हाल में घर पहुंचना जरुरी था। हमें विसर्जन में देर हो गई करीब १० बज गए- मैं बहुत डरा हुआ था की घर पर बहुत पिटाई होगी - मैंने नित्यानंद को कहा की वो मेरे साथ मेरे घर चले - मेरे घर वाले नित्यानद को एक अच्छा लड़का मानते थे और सच में वह काफी जिम्मेदार था भी - जब हम गर पहुंचे और घंटी बजाई तो पिताजी ने दरवाजा खोला - दरवाजा खोलने से पहले पिताजी ने व्यू होल से देखा - और मैंने एक आवाज सुनी जैसे किसीने कुछ ऊपर से पटका हो - दरवाजा खुला तो पिताजी नित्यानंद को देखकर शांत होगये थे - पर मैंने देखा की दरवाजे के पास एक चप्पल पड़ी थी - सिंगल - यही वो चीज थी जिसकी आवाज मैंने सुनी थी - और जिससे मेरा स्वागत होना था - घर के सभी लोग ऐसे खड़े थे की अब क्या होगा - परन्तु नित्यानंद की वजह से मैं बच गया. - थैंक्स भाई।
दिसंबर में हमारे स्कूल के EXAMS पुरे हुए - हमे तीन महीनों का समय मिलता था तैयारी के लिए। घर पर टूशन टीचर आते थे।
दोस्तों आज भी मेरे पास बोर्ड की मार्कशीट और सर्टिफिकेट है.
दोस्तों स्कूल में तो हम एक तरह की मस्ती करते थे परन्तु जब घर पर होते थे तो मस्ती अलग तरह की होती थी
अगले ब्लॉग में कुछ घर मोहल्ले की मस्ती के बारे में लिखने का प्रयास करूँगा।
मेरे साथ जुड़न के लिए धन्यवाद्।
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