आज मैं आप लोगों को मेरे बचपन की कुछ खट्टी मीठी बातें बताने गए रहा हूँ।
जैसा की मैंने पहले भी बताया है कि मैं बहुत शर्मीला लड़का था। मैं खाने में भी बहुत ही कम सब्जियां खाता था, फल तो मैं अभी तक नहीं खाता सिर्फ हापुस आम को छोड़ कर। मैंने आम भी मेरे ख्याल से कुछ आठ दस साल पहले ही खाना शुरू किया है. इस बात को लेकर मेरे बारे में बहुत ही बातें होती है और आज भी मुझे दावत पर बुलाने के समय लोगों को मेरी खाने की पसंद को ध्यान में रखना होता है।
मेरी माँ बताया करती हैं कि मेरे बड़े मामाजी - गोपाल मामाजी - काफी कोशिश करते थे मुझे आम और फल और सब्जियां खिलने की परन्तु मैं कभी भी नहीं खा पाया। मुझे उल्टियां हो जाया करती थी। एक तो आलू मुझे अत्यंत ही प्रिय है. इसे किसी भी तरह - तल के , भून के, सब्जी में , पराठा में , पापड़ में , हलुए में , यानि की कैसे भी आलू दे दो मेरा काम हो जायेगा। मैं कोई भी हरी सब्जिया नहीं खाता , ककड़ी, टमाटर, गाजर, आदि भी नहीं खता था - नहीं खता हूँ अभी भी। मुझे बटर, चीज़, मिर्च मसाला,तीखा चटपटा ऐसी चीजें बहुत ही पसंद है। मीठा तो मुझे चाहिए ही।
बचपन में मुझे गुल्ली डंडा , सात पिट्टू , पकड़ा पकड़ी, और कंचे आदि हिंदुस्तानी खेल बहुत पसंद थे। कई बार मुझे चोटें भी आई और मेरी आँखों के पास तीन बार बड़ी चोटें आई जिसमे काम से काम दो बार टांके भी लगवाने पड़े. मैं चोट का बड़ा पक्का था मुझे दर्द का अहसास काम ही होता था - या यूँ कहें की मुझमे दर्द सहने की ज्यादा शक्ति थी। शरीर से गोलमटोल होने के बावजूद मेरी हड्डियां मजबूत थी। मैं तो बताना ही भूल गया की स्कूल में मुझे मेरे साथी - हाथी कह कर बुलाते थे और मुझे बड़ा मजा आता था।
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| गुल्ली डंडा |
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| सात पिट्टू |
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| कंचे |
जैसे जैसे बड़े होने लगे खेलों की पसंद बदल गई यह "खो खो " "कबड्डी" में कब बदल गई पता भी नहीं पड़ा.
१०वी के पास आते आते फुट बॉल, का दीवाना हो गया, स्कूल के वार्षिक खेल उत्सव में मैं - १०० मीटर , २०० मीटर, रिले रेस , SHOT PUT , भाला फेक (JAVELIN THROW ) और कॉलेज में तो FOOT BALL , क्रिकेट के साथ साथ टेबल टेनिस को बड़े ही अच्छे से खेलता था. - कॉलेज के दिनों में मैं नौका चलन (ROWING)भी करता था - शरीर काफी तंदुरुस्त रहा करता था - मैंने किसी भी खेल में कोई पदक नहीं लिए --परन्तु हिस्सा जरूर लेता था. फुटबॉल खेलते समय घुटनों पर बहुत चोट खाई थी जिसका दर्द अब इस उम्र में महसूस होता है. उस समय इतने पैड्स नहीं होते थे।
घर में भाई के साथ शतरंज खेलता था जो हमेशा झगडे पर ख़तम होती थी - माँ उसे झगडे की जड़ कहा करती थी मुझे याद नहीं कभी भी हमारा गेम पूरा हुआ करता था। पिताजी के साथ कभी कभी चौपड़ भी खेल लेते थे हम लोग। कभी कभी ताश भी खेल लिया करते थे - बहुत कम।
कॉलेज के दिनों में ही मैंने रेडिओ असेम्बली की क्लास की, उन्ही दिनों मैंने ड्राइविंग भी सीखी - मैंने करीब १९७६-७७ तक बहुत मजे किये कई तरह की एक्टिविटी की। कॉलेज में पब्लिक बस में फुट स्टेप पर लटक के जाना, कॉलेज के क्लब रूम में मस्ती करना - कैंटीन में मस्ती करना - आदि आदि।
आज बस इतना ही - जल्द ही आगे की यादों को लिखने बैठुंगा
शुभ रात्रि --- जय हिन्द।






















