नमस्कार दोस्तों ,
कैसे हो, आशा करता हूँ की अच्छे होगें। सामाजिक दुरी का पालन करें और स्वस्थ रहें।
कल मैंने आपको अपनी पहली स्कूल के कुछ किस्से बताये थे। आज मैं आपको मेरे दूसरे स्कूल " आदर्श हिंदी हाई स्कूल " के बारे में बताऊंगा।
जब मेरे परिवार ने घर बदला तो मेरा स्कूल भी बदलना पड़ा। मेरे घर के कुछ दुरी पर एक स्कूल था जिसका नाम " आदर्श हिंदी हाई स्कूल " था मैंने उसमे ९वी क्लास में एडमिशन लिया। उस समय हमे अपने विषय चुनने होते थे और मैंने COMPULSORY LANGUAGE / SUBJECTS के साथ PHYSICS , CHEMISTRY , और MATHEMATICS को चुना। मैं SCIENTIST / ENGINEER बनना चाहता था। मेरे एक मामा ( माँ का भाई) ATOMIC PHYSICS का प्रोफेसर था अमेरिका में और मैं भी विलायत जा कर पढ़ना चाहता था जो नहीं हो सका - खैर छोड़ो उस बात को।
हाँ तो हमारे इस नए स्कूल में सुबह लड़कियों को क्लासेज लगती थी और साफ़ सफाई के बाद १० .३० बजे से ५.०० बजे तक हमारी क्लासेज लगती थी २.०० को लंच ब्रेक होता था और २.३० को दोबारा अटेंडेंस होती थी.
करीब १२ या १८ महीनों तक तो सब ठीक था - यहाँ बतादूँ कि स्कूल सिर्फ ११ वी तक ही हुआ करती थी और उसके बाद बोर्ड के EXAMS होते थे और हमें कॉलेज में जाना होता था - अतः मुझे इस स्कूल में केवन ३ साल ही बिताना था - और १०वी और ११वी के स्टूडेंट्स सीनियर हो जाते थे -
हमारे स्कूल के पास एक सिनेमाघर था. हमारा प्रधान अध्यापक ब्लड प्रेशर का मरीज था - मुझे याद है की मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ कभी कभी पहली क्लास करके - वॉचमैन को पैसा दे कर स्कूल से निकल जाते थे और पास के सिनेमा हॉल में जा कर मूवी दिखा करते थे और फिर लंच में सब बच्चों के साथ क्लास अटेंड करते थे, कभी कभी जब पकडे जाते तो प्रधान अध्यापक के सामने लाये जाते। हमें पता था की उन्हें हार्ट की प्रॉब्लम है , हम ऐसा नाटक करते थे की वो हमें छोड़ देते थे.
हम पढाई में ठीक थे और स्कूल के अन्य कार्यक्रम में भी हिस्सा लेते थे इसलिए हम स्कूल में फेमस थे.
मेरे कुछ दोस्त मुझे कुछ सालो पहले FACEBOOK के जरिये मिले , थैंक्स तो सूरबीर - जिसने मेरी प्रोफाइल देखकर मुझे फ़ोन किया। मेरे स्कूल के समय का एक खास दोस्त था कमल सिन्हा - सूरबीर ने मेरी और उसकी बात कराइ हम आज भी कभी कभी बात कर लेते हैं. एक और दोस्त था नित्यानंद शर्मा - लेफ्टि था. कमल और नित्यानंद का घर पर आना जाना था
इस स्कूल में ज्यादा ध्यान पढाई पर ही रहता था क्योंकि ११ वी के बाद बोर्ड के EXAMS थे और हम ज्यादा मस्ती नहीं कर सकते थे.
११ वी क्लास की बात है हमारे स्कूल में सरस्वती पूजा का आयोजन किया गया - सरस्वती मूर्ति के विसर्जन के समय - हमलोग सीनियर थे इसलिए हमे जाना था और मेरे घर में ८ बजे के पहले हर हाल में घर पहुंचना जरुरी था। हमें विसर्जन में देर हो गई करीब १० बज गए- मैं बहुत डरा हुआ था की घर पर बहुत पिटाई होगी - मैंने नित्यानंद को कहा की वो मेरे साथ मेरे घर चले - मेरे घर वाले नित्यानद को एक अच्छा लड़का मानते थे और सच में वह काफी जिम्मेदार था भी - जब हम गर पहुंचे और घंटी बजाई तो पिताजी ने दरवाजा खोला - दरवाजा खोलने से पहले पिताजी ने व्यू होल से देखा - और मैंने एक आवाज सुनी जैसे किसीने कुछ ऊपर से पटका हो - दरवाजा खुला तो पिताजी नित्यानंद को देखकर शांत होगये थे - पर मैंने देखा की दरवाजे के पास एक चप्पल पड़ी थी - सिंगल - यही वो चीज थी जिसकी आवाज मैंने सुनी थी - और जिससे मेरा स्वागत होना था - घर के सभी लोग ऐसे खड़े थे की अब क्या होगा - परन्तु नित्यानंद की वजह से मैं बच गया. - थैंक्स भाई।
दिसंबर में हमारे स्कूल के EXAMS पुरे हुए - हमे तीन महीनों का समय मिलता था तैयारी के लिए। घर पर टूशन टीचर आते थे।
दोस्तों आज भी मेरे पास बोर्ड की मार्कशीट और सर्टिफिकेट है.
दोस्तों स्कूल में तो हम एक तरह की मस्ती करते थे परन्तु जब घर पर होते थे तो मस्ती अलग तरह की होती थी
अगले ब्लॉग में कुछ घर मोहल्ले की मस्ती के बारे में लिखने का प्रयास करूँगा।
मेरे साथ जुड़न के लिए धन्यवाद्।
कैसे हो, आशा करता हूँ की अच्छे होगें। सामाजिक दुरी का पालन करें और स्वस्थ रहें।
कल मैंने आपको अपनी पहली स्कूल के कुछ किस्से बताये थे। आज मैं आपको मेरे दूसरे स्कूल " आदर्श हिंदी हाई स्कूल " के बारे में बताऊंगा।
जब मेरे परिवार ने घर बदला तो मेरा स्कूल भी बदलना पड़ा। मेरे घर के कुछ दुरी पर एक स्कूल था जिसका नाम " आदर्श हिंदी हाई स्कूल " था मैंने उसमे ९वी क्लास में एडमिशन लिया। उस समय हमे अपने विषय चुनने होते थे और मैंने COMPULSORY LANGUAGE / SUBJECTS के साथ PHYSICS , CHEMISTRY , और MATHEMATICS को चुना। मैं SCIENTIST / ENGINEER बनना चाहता था। मेरे एक मामा ( माँ का भाई) ATOMIC PHYSICS का प्रोफेसर था अमेरिका में और मैं भी विलायत जा कर पढ़ना चाहता था जो नहीं हो सका - खैर छोड़ो उस बात को।
हाँ तो हमारे इस नए स्कूल में सुबह लड़कियों को क्लासेज लगती थी और साफ़ सफाई के बाद १० .३० बजे से ५.०० बजे तक हमारी क्लासेज लगती थी २.०० को लंच ब्रेक होता था और २.३० को दोबारा अटेंडेंस होती थी.
करीब १२ या १८ महीनों तक तो सब ठीक था - यहाँ बतादूँ कि स्कूल सिर्फ ११ वी तक ही हुआ करती थी और उसके बाद बोर्ड के EXAMS होते थे और हमें कॉलेज में जाना होता था - अतः मुझे इस स्कूल में केवन ३ साल ही बिताना था - और १०वी और ११वी के स्टूडेंट्स सीनियर हो जाते थे -
हमारे स्कूल के पास एक सिनेमाघर था. हमारा प्रधान अध्यापक ब्लड प्रेशर का मरीज था - मुझे याद है की मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ कभी कभी पहली क्लास करके - वॉचमैन को पैसा दे कर स्कूल से निकल जाते थे और पास के सिनेमा हॉल में जा कर मूवी दिखा करते थे और फिर लंच में सब बच्चों के साथ क्लास अटेंड करते थे, कभी कभी जब पकडे जाते तो प्रधान अध्यापक के सामने लाये जाते। हमें पता था की उन्हें हार्ट की प्रॉब्लम है , हम ऐसा नाटक करते थे की वो हमें छोड़ देते थे.
हम पढाई में ठीक थे और स्कूल के अन्य कार्यक्रम में भी हिस्सा लेते थे इसलिए हम स्कूल में फेमस थे.
मेरे कुछ दोस्त मुझे कुछ सालो पहले FACEBOOK के जरिये मिले , थैंक्स तो सूरबीर - जिसने मेरी प्रोफाइल देखकर मुझे फ़ोन किया। मेरे स्कूल के समय का एक खास दोस्त था कमल सिन्हा - सूरबीर ने मेरी और उसकी बात कराइ हम आज भी कभी कभी बात कर लेते हैं. एक और दोस्त था नित्यानंद शर्मा - लेफ्टि था. कमल और नित्यानंद का घर पर आना जाना था
इस स्कूल में ज्यादा ध्यान पढाई पर ही रहता था क्योंकि ११ वी के बाद बोर्ड के EXAMS थे और हम ज्यादा मस्ती नहीं कर सकते थे.
११ वी क्लास की बात है हमारे स्कूल में सरस्वती पूजा का आयोजन किया गया - सरस्वती मूर्ति के विसर्जन के समय - हमलोग सीनियर थे इसलिए हमे जाना था और मेरे घर में ८ बजे के पहले हर हाल में घर पहुंचना जरुरी था। हमें विसर्जन में देर हो गई करीब १० बज गए- मैं बहुत डरा हुआ था की घर पर बहुत पिटाई होगी - मैंने नित्यानंद को कहा की वो मेरे साथ मेरे घर चले - मेरे घर वाले नित्यानद को एक अच्छा लड़का मानते थे और सच में वह काफी जिम्मेदार था भी - जब हम गर पहुंचे और घंटी बजाई तो पिताजी ने दरवाजा खोला - दरवाजा खोलने से पहले पिताजी ने व्यू होल से देखा - और मैंने एक आवाज सुनी जैसे किसीने कुछ ऊपर से पटका हो - दरवाजा खुला तो पिताजी नित्यानंद को देखकर शांत होगये थे - पर मैंने देखा की दरवाजे के पास एक चप्पल पड़ी थी - सिंगल - यही वो चीज थी जिसकी आवाज मैंने सुनी थी - और जिससे मेरा स्वागत होना था - घर के सभी लोग ऐसे खड़े थे की अब क्या होगा - परन्तु नित्यानंद की वजह से मैं बच गया. - थैंक्स भाई।
दिसंबर में हमारे स्कूल के EXAMS पुरे हुए - हमे तीन महीनों का समय मिलता था तैयारी के लिए। घर पर टूशन टीचर आते थे।
दोस्तों आज भी मेरे पास बोर्ड की मार्कशीट और सर्टिफिकेट है.
दोस्तों स्कूल में तो हम एक तरह की मस्ती करते थे परन्तु जब घर पर होते थे तो मस्ती अलग तरह की होती थी
अगले ब्लॉग में कुछ घर मोहल्ले की मस्ती के बारे में लिखने का प्रयास करूँगा।
मेरे साथ जुड़न के लिए धन्यवाद्।


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