नमस्कार दोस्तों ,
अभी कुछ दिन हुए मैंने अपना यह ब्लॉग बनाया है।
आजकल पूरी दुनिया CORONA के आतंक से पीड़ित है और मैं भी अपना काम काज छोड़ कर घर में बैठा हूँ.
जैसा की मैंने बताया कि मैं एक ६२ साल का मुंबई में रहने वाला व्यापारी हूँ और मैं अपनी पत्नी सुमन , बेटे , बहु और पोते के साथ रहता हूँ।
ऑफिस और फैक्ट्री की आपा धापी के उलट घर में रहने का एक अलग ही तजुर्बा है।
मुंबई तो भारत में CORONA का एक हॉट स्पॉट बना हुआ है।
अभी कुछ दिनों पहले ही (२३ फरवरी २०२०) को पिताजी का स्वर्गवास हुआ था।
अतः २३ /२/२० से ६ / ३ / २० तक तो क्रिया कर्म के हिसाब से ऑफिस नहीं जा सका ,
फिर होली की छुट्टी आ गई ,
फिर २३/३/२० से या कहें तो २०/ ३ / २० से ही पहला ट्रायल,फिर २३ से लॉक डाउन ,
बीच में कुछ दिन काम करने का अवसर मिला वार्ना १ महीना २० दिन हो गए काम पर ध्यान दिए हुए।
सोच था की चलो घर पर हैं तो खाने को मनपसंद बनवाकर खाऊंगा। परन्तु बहार की तरह घर पर भी लॉक डाउन लगा हुआ है. चाय ऑफिस में घंटी बजाते ही आ जाती थी उसपर १४४ धरा लग गई दिन में ४ बार से ज्यादा नहीं मिलेगी। समोसा भजिया ( पकौड़े ) पर पूर्ण लॉक डाउन।
सादा खाना और अनुशाषित दिनचर्या जिसको जीवन के ६२ सालों में कभी नहीं जिया अरे भाई हम तो उन लोगों में से हैं जो वर्कर्स को कह कर समोसे, बटाटा वड़ा , जैसे नाश्ते बहार से मँगवा लेते थे - सब बंद
बहुत कोशिश की थी पान सुपाड़ी छोड़ने की पहले परन्तु CORONA ने छुडवा दिया।
एक चीज तो जरूर हुई इस लॉक डाउन की वजह से की हर आदमी जिसको भी घर में अपनों के साथ रहने का मौका मिला उसको परिवार में साथ रहने की जो आदत पड़ गई है वह सराहनीय है.
इन दिनों में आदमी अपने आप को समझने की कोशिश करते दिखाई देता है। अपने हुनर को समझने का समय उसे मिल रहा है।
भगवन के प्रति लोगों का झुकाओ बढ़ा है। फिजूल खर्च काफ़ी काम हो गया है। दूषित वातावरण से बड़े शहरों को काफ़ी रहत मिली है। हर कोई मशीन की तरह हो गया था न कोई रिश्तों की कदर थी न ही कोई पर्यावरण की परवाह सिर्फ भाग दौड़ पागलों की तरह।
दोस्तों सकारात्मक सोचोगे तो यह कदम काफ़ी सही है और काफ़ी अच्छे परिणाम दे कर जाने वाले है और मानव जाती को एक बड़ा सबक दे कर जाएगी।
हर समाज में कुछ ऐसे लोग होते है जिनके दिमाग का कोई इलाज नहीं हो सकता , उनमे सिर्फ अनपढ़ ही नहीं परन्तु पढ़े लिखे ( कहने को तो बुद्धिजीवी ) वर्ग भी ऐसे है जो अपने परिवार को तो बचाये रखते है परन्तु एक ऐसा वातावरण तैयार करते हैं जिसको किसी भी तर्क से सही नहीं कहा जा सकता।
अपने निजी फायदे के लिए कितनी भी अराजकता फैले, कितनी ही जाने जाए , कितनों को भी असुविधा हो , उन्हें हर हाल में देश के शासन के किसी भी बात को न मानते हुए एक अराजकता वाली स्तिथि पैदा करना और उसे पागलपन की हद के भी बहार जा कर साथ देना , बढ़ावा देना और कुतर्क करते हुए किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करने में इतने अंधे हो जाना की उन्हें ये भी ध्यान नहीं रहे की वो देश के हित के विरुद्ध काम कर रहें हैं
पता नहीं कैसे विध्वंशक दिमाग और तोड़ फोड़ की मानसिकता के साथ कातिलाना साजिश करके कुछ हासिल भी कर लोगे तो क्या - तुम्हारा स्वाभाव तो हर समय तुम्हारे साथ ही रहता है और वह २४ सों घंटे तुम्हे ही कास्ट देगा।
और हाँ , अब वो पहले वाले दिन नहीं रह गए , SOCIAL MEDIA और COMMUNICATION के इस दौर में आप चाहो तो किसी को भी दबा नहीं सकते और आपको किसी को भी काम कर नहीं समझना चाहिए। ये जो १५ करोड़ VS ११० करोड़ जैसी बातें करने वाले अब सिर्फ अपने दिमाग़ के दिवालिये पन को ही दर्शाते है और कोई भी उन्हें SIRIOUSLY नहीं लेता - हंसी के पत्र बनते है.
खैर हमें तो सकारात्मक सोच को ही आगे बढ़ाना है और विध्वंशक विचरधारा को निष्क्रिय करते हुए आगे बढ़ना है.
जय हिन्द ===
अभी कुछ दिन हुए मैंने अपना यह ब्लॉग बनाया है।
आजकल पूरी दुनिया CORONA के आतंक से पीड़ित है और मैं भी अपना काम काज छोड़ कर घर में बैठा हूँ.
जैसा की मैंने बताया कि मैं एक ६२ साल का मुंबई में रहने वाला व्यापारी हूँ और मैं अपनी पत्नी सुमन , बेटे , बहु और पोते के साथ रहता हूँ।
ऑफिस और फैक्ट्री की आपा धापी के उलट घर में रहने का एक अलग ही तजुर्बा है।
मुंबई तो भारत में CORONA का एक हॉट स्पॉट बना हुआ है।
अभी कुछ दिनों पहले ही (२३ फरवरी २०२०) को पिताजी का स्वर्गवास हुआ था।
अतः २३ /२/२० से ६ / ३ / २० तक तो क्रिया कर्म के हिसाब से ऑफिस नहीं जा सका ,
फिर होली की छुट्टी आ गई ,
फिर २३/३/२० से या कहें तो २०/ ३ / २० से ही पहला ट्रायल,फिर २३ से लॉक डाउन ,
बीच में कुछ दिन काम करने का अवसर मिला वार्ना १ महीना २० दिन हो गए काम पर ध्यान दिए हुए।
सोच था की चलो घर पर हैं तो खाने को मनपसंद बनवाकर खाऊंगा। परन्तु बहार की तरह घर पर भी लॉक डाउन लगा हुआ है. चाय ऑफिस में घंटी बजाते ही आ जाती थी उसपर १४४ धरा लग गई दिन में ४ बार से ज्यादा नहीं मिलेगी। समोसा भजिया ( पकौड़े ) पर पूर्ण लॉक डाउन।
सादा खाना और अनुशाषित दिनचर्या जिसको जीवन के ६२ सालों में कभी नहीं जिया अरे भाई हम तो उन लोगों में से हैं जो वर्कर्स को कह कर समोसे, बटाटा वड़ा , जैसे नाश्ते बहार से मँगवा लेते थे - सब बंद
बहुत कोशिश की थी पान सुपाड़ी छोड़ने की पहले परन्तु CORONA ने छुडवा दिया।
एक चीज तो जरूर हुई इस लॉक डाउन की वजह से की हर आदमी जिसको भी घर में अपनों के साथ रहने का मौका मिला उसको परिवार में साथ रहने की जो आदत पड़ गई है वह सराहनीय है.
इन दिनों में आदमी अपने आप को समझने की कोशिश करते दिखाई देता है। अपने हुनर को समझने का समय उसे मिल रहा है।
भगवन के प्रति लोगों का झुकाओ बढ़ा है। फिजूल खर्च काफ़ी काम हो गया है। दूषित वातावरण से बड़े शहरों को काफ़ी रहत मिली है। हर कोई मशीन की तरह हो गया था न कोई रिश्तों की कदर थी न ही कोई पर्यावरण की परवाह सिर्फ भाग दौड़ पागलों की तरह।
दोस्तों सकारात्मक सोचोगे तो यह कदम काफ़ी सही है और काफ़ी अच्छे परिणाम दे कर जाने वाले है और मानव जाती को एक बड़ा सबक दे कर जाएगी।
हर समाज में कुछ ऐसे लोग होते है जिनके दिमाग का कोई इलाज नहीं हो सकता , उनमे सिर्फ अनपढ़ ही नहीं परन्तु पढ़े लिखे ( कहने को तो बुद्धिजीवी ) वर्ग भी ऐसे है जो अपने परिवार को तो बचाये रखते है परन्तु एक ऐसा वातावरण तैयार करते हैं जिसको किसी भी तर्क से सही नहीं कहा जा सकता।
अपने निजी फायदे के लिए कितनी भी अराजकता फैले, कितनी ही जाने जाए , कितनों को भी असुविधा हो , उन्हें हर हाल में देश के शासन के किसी भी बात को न मानते हुए एक अराजकता वाली स्तिथि पैदा करना और उसे पागलपन की हद के भी बहार जा कर साथ देना , बढ़ावा देना और कुतर्क करते हुए किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करने में इतने अंधे हो जाना की उन्हें ये भी ध्यान नहीं रहे की वो देश के हित के विरुद्ध काम कर रहें हैं
पता नहीं कैसे विध्वंशक दिमाग और तोड़ फोड़ की मानसिकता के साथ कातिलाना साजिश करके कुछ हासिल भी कर लोगे तो क्या - तुम्हारा स्वाभाव तो हर समय तुम्हारे साथ ही रहता है और वह २४ सों घंटे तुम्हे ही कास्ट देगा।
और हाँ , अब वो पहले वाले दिन नहीं रह गए , SOCIAL MEDIA और COMMUNICATION के इस दौर में आप चाहो तो किसी को भी दबा नहीं सकते और आपको किसी को भी काम कर नहीं समझना चाहिए। ये जो १५ करोड़ VS ११० करोड़ जैसी बातें करने वाले अब सिर्फ अपने दिमाग़ के दिवालिये पन को ही दर्शाते है और कोई भी उन्हें SIRIOUSLY नहीं लेता - हंसी के पत्र बनते है.
खैर हमें तो सकारात्मक सोच को ही आगे बढ़ाना है और विध्वंशक विचरधारा को निष्क्रिय करते हुए आगे बढ़ना है.
जय हिन्द ===
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