Saturday, April 25, 2020

स्कूल की बदमाशियां

नमस्कार दोस्तों ,

कैसे हो , आशा करता हूँ कि सब स्वस्थ होंगे।  कोरोना से अपने आपको बचाकर रखें यही कामना करता हूँ।

आज मैं आपको मेरे स्कूल के समय की कुछ ऐसी  बदमाशियों के बारे में बताऊंगा जो आज भी मुझे याद है।

दौलत राम नौपानी विद्यालय मेरा पहला स्कूल था।  इस स्कूल में मैं ९ वी कक्षा तक पढ़ा हूँ।  शायद १९७० में मैंने स्कूल को छोड़ा था।  स्कूल जाने के लिए हमारे लिए ( मैं और मेरा भाई ) स्कूल बस का इंतजाम किया गया था।  जहाँ से हम स्कूल बस में चढ़ते थे वह एक पोस्टऑफिस के पास था। 

१.  हम कई बार स्कूल नहीं जाने के लिए उस पोस्ट ऑफिस में छिप जाया करते थे परन्तु हमे हाथ रिक्शे से स्कूल छोड़ कर आया जाता था , मार पड़ती थी वो बोनोस में।

मैं बता दूँ कि  मेरा इरादा किसी भी अध्यापक का अनादर करने का नहीं है मैं तो सिर्फ अपनी कुछ यादों को समेट कर यहाँ प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूँ - कृपया अन्यथा ना लें। 

२. हमरे स्कूल में एक अध्यापक थे जो हमे गणित सिखाते थे, उनका नाम था श्री मदन गोपाल जी बोहरा , बहुत ही कड़क व्यक्ति थे।  उनके अपना नाम म.गो.बो. लिखते थे , वो हमारे स्कूल के Scouts and Guides के ट्रेनर थे और उनका एक सिद्धांत था की उनके Scouts टीम के किसी भी कैडेट और उसके भाई पर पढ़ाई के समय विशेष नजर होती थी और विशेष ही punishment मिलती थी।  मेरा बड़ा भाई Scouts का कैडेट था अतः मेरे ऊपर उनकी विशेष कृपा होती थी और पता नहीं क्यों मैं हमेश उनका ही होमवर्क पूरा नहीं करता था और नियम से उनके द्वारा मेरी पीटाई होती थी।  

एक बार की बात है उन्होंने कुछ होम वर्क दिया था और हमेशा की तरह मैंने नहीं किया था।  सर क्लास में आये और कहा की जो कोई भी होम वर्क नहीं किया है वो बेंच पर खड़े हो जाये।  दोस्तों - मैं बैठा रहा और बेंच पर खड़ा नहीं हुआ।  यह देख कर हमारे अध्यापक जी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुझे पूछा - सुबोध क्या तुमने होम वर्क किया है ? - मैं चुप रहा. - उनकी एक आदत थी की वे एक तरफ से चेक करते हुए आते है और लास्ट तक सभी बच्चों की कॉपियां चेक करते थे. क्लास में करीब ३० से ३५ बच्चे होते थे और मेरा नंबर २५वा था।  जब सर २० नंबर के लड़के की कॉपी चेक करने आये तब मैं बेंच पर खड़ा हो गया - पहले से क्यों खड़ा होना - बस फिर क्या  था - सर ने जितने बच्चों को सजा देने के लिए अलग किय था और जो बच्चे बेंच पर खड़े थे उन सब को बैठ जाने को कहा और मेरी बहुत ही अच्छे से पिटाई की गई।  मुझे आज भी याद है - 

परन्तु उसके बाद मैं हमेशा हर विषय का होमवर्क पूरा करके जाता था।  मुझे गणित में पहली विद्या उन्ही से मिली - मैं आज भी उनकी याद में नतमस्तक हो जाता हूँ.

३. एक थे हमारे हिंदी के अध्यापक झा सर , उनका  शुद्ध हिंदी उच्चारण पर बहुत ध्यान रहता था
  जैसे शनि और सनी   और यदि किसी बच्चे ने उच्चारण गलत कर दिया तो उस दिन की पढाई ख़तम और उस बच्चे की धुलाई शुरू।  अच्छा यहाँ एक बात बता दूँ की उन्हें दामे की बीमारी थी और वो ज्यादा मार नहीं सकते थे - दो तीन थप्पड़ लगा कर बैठ जाते थे - थोड़ा सुस्ता कर कीर मरने आते थे और कुछ कुछ कहते रहते थे उनमे से एक बात जो वो कहते थे वह था " पशु कहि के, सुन्दर वन से आये हो तुम सब , शुद्ध हिंदी नहीं बोल सकते क्या " - हम लोगों को उन्हें छेड़ने में बहुत मज़ा आता था 

मैं बता दूँ की लम्बाई होने के कारन मुझे हमेश पिछली बेंचों पर ही बैठाया जाता था। यानि की Back Benchers 

४.  हमारे इतिहास के टीचर को बाल पकड़ कर मारना अच्छा लगता था और मैं हमेशा मिलेट्री कट में रहता था और जब भी वे मेरे बाल पकड़ते मैं डक कर जाता था फिर मुझे मुर्गा बनाया जाता था। 

५. हमारे फिजिकल ट्रेनिंग (P . T .) के टीचर बंगाली थे और उन्हें हिंदी इतनी अच्छी नहीं आती थी - बहुत ही अच्छे इंसान और अच्छी कसरतें करते थे।  हमारे खेल कूद का भी पूरा ख्याल रखते थे बस जब वो गुस्सा होते थे या कहें कि गुस्सा दिलाया जाता था तो कहते थे " देखो - जोदी तुम लोग बदमाशी करूँगा , तो मैं भी रोकूंगा  और तुम लोगों को भी रुकूंगा  और ३ घंटे तक P. T. करूँगा . 

ये कुछ यादें जो मेरे बचपन की मुझे आज भी कभी कभी गुदगुदा जाती हैं। हालाँकि यह मार पीट का सिलसिला रोज नहीं होता था परन्तु कहते हैं की गुरु की चोट विद्या की पोट .

मुझे याद नहीं की ७वी कक्षा के बाद मैंने किसी भी अध्यापक से कभी मार खाई हो।  मैं आज भी सभी टीचर्स की बहुत इज्जत करता हूँ। 

ये कुछ यादें है मेरे पहले स्कूल की।  अगली बार मेरे दूसरे स्कूल की यादों को समेत कर आपके सामने रखने का प्रयास करूँगा - तब तक के लिए -  नमस्कार - खुश रहो सुखी रहो.

जय हिन्द


जहाँ तक मुझे याद है हमारे समय में ये सिम्बोल सिर्फ बीच  की किताब और उगता हुआ सूरज हुआ करता था ये कमल का फूल और ये ऊपर का आवरण नहीं होता था।  

श्री मदन जी की कोई तस्वीर तो नहीं है परन्तु उनकी याद में  स्काउट्स का चिन्ह के द्वारा श्रधंजलि प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूँ  . 
 

दोस्तों यहाँ बतादूँ की स्काउट्स की ड्रेस में एक रस्सी होती थी और उससे कई तरह की गांठे (KNOTS ) सिखाई जाती थी , मैंने मेरे भाई से कई तरह की गांठे बनानी सिखी है कुछ तो मुझे आज भी याद है.

मैंने बुक बंधन (BOOK BINDING ) भी उन्ही से सीखी है शायद काफी छोटा था मैं परन्तु मुझे आज भी याद है

दोस्तों ये तो यादों के छिलके है जितना निकलोगे निकलते जायेंगे  -

फिर मिलेंगे -  जय हिन्द।

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